Wednesday, 17 October 2018

मां दुर्गा से जुडे रहस्य


हिन्दू धर्म में मां दुर्गा का अपना एक खास महत्व है। नवरात्रि आते ही हर जगह मां के मंदिर सज जाते हैं और भक्त कतारों में खड़े होकर माता के दर्शन की प्रतीक्षा करते हैं। मां दुर्गा को पहाड़ावाली, शेरावाली, जगदम्बा, मां अम्बे, आदि नामों से भी जाना जाता है। माता के मंदिर पूरे भारत में बने हुए हैं। अगर आप मंदिरों की संख्या गिनने लगेंगे तो थक जायेंगे।

सरस्वती, लक्ष्मी, और पार्वती माता का ही रूप हैं और त्रिदेव की पत्नियां भी हैं। माता के बारे में हमारे पुराणों और शास्त्रों में बहुत सी कथायें हैं। देवी पूरण में देवी के रहस्यों का खुलासा होता है।

आज हम आपको माता के बारे में कुछ ऐसी बातें बताने जा रहे हैं, जो उनके हर भक्त को जाननी चाहिए। हालांकि हम आपको पूरी बात तो नहीं लेकिन जरूरत की लगभग सभी बातें बता सकते हैं।

आखिर कौन है मातारानी?

अम्बिका:👉 अकेले रहकर हर तरफ घूमने वाले सदाशिव ने अपने शरीर से शक्ति की रचना की, जो उनसे कभी भी अलग होने वाली नहीं थी। भगवान शिव की उस शक्ति को विकार रहित अविनाशी, बुद्धि तत्व बताया गया। उसी शक्ति को अम्बिका के नाम से जाना जाता है। इनकी 8 भुजाएं हैं और ये अनेक शस्त्र धारण करती हैं। यह कालरूप सदाशिव की पत्नी हैं इन्हें जगदम्बा के नाम से भी जाना जाता है।

देवी दुर्गा:👉 हिरण्याक्ष के बारे में तो आप जानते ही हैं। यह अत्यंत क्रूर राक्षस था। इसके प्रकोप से धरती वासी ही नहीं स्वर्ग के देवता भी परेशान हो चुके थे। इसलिए उन्होंने मां अम्बिका की आराधना की। उन्होंने हिरण्याक्ष को उसकी सेना सहित नष्ट कर दिया, तब से उन्हें दुर्गा के नाम से भी जाना जाने लगा।

माता सती:👉 राजा दक्ष की पुत्री सती से भगवन शंकर की शादी हुई थी। एक बार एक यज्ञ में भगवन शंकर को ना बुलाये जाने पर सती क्रोधित हो गयीं और यज्ञ कुंड में कूदकर अपने प्राणों की आहुति दे दीं। इसके बाद उनके शरीर के अंग जहां-जहां गिरे, वहां शक्तिपीठों का निर्माण हो गया। बाद में सती ने हिमालयराज के यहां पार्वती के रूप में जन्म लिया और घोर तपस्या करके शिव को पति के रूप में पा लिया।

पार्वती:👉 सती के दूसरे रूप को पार्वती के नाम से जाना जाता है। माता पार्वती को भी दुर्गा का स्वरूप माना जाता है, लेकिन वह दुर्गा नहीं हैं। इनके दो पुत्र गणेश और कार्तिकेय हैं।

कैटभा: 👉 हिरण्याक्ष की तरफ से युद्ध करने वाले मधु और कैटभ नाम के दो भाइयों का वध करने के बाद माता को इस नाम से भी पुकारा जाने लगा।

काली:👉 भगवान शंकर की तीन पत्नियां थी। उमा उनकी तीसरी पत्नी थीं। उत्तराखंड में देवी उमा का एकमात्र मंदिर है। भगवान शंकर की चौथी पत्नी के रूप में मां काली की पूजा की जाती है। इन्होने इस धरती को भयानक राक्षसों के आतंक से मुक्त किया। काली भी देवी अम्बा की पुत्री थीं। इन्होने ही रक्तबीज नाम के भयानक दानव का वध किया था।

महिषासुर मर्दिनी👉 ऋषि कात्यायन की पुत्री ने ही राम्भासुर के पुत्र महिषासुर का वध किया था, इसके बाद ही उन्हें महिषासुर मर्दिनी के नाम से जाना जाने लगा। एक अन्य कहानी के अनुसार महिषासुर के आतंक से त्रस्त सभी देवताओं ने मिलकर अपने शरीर से एक ज्योति निकाली जो एक सुन्दर कन्या के रूप में प्रकट हुई। सभी ने अपने अस्त्र-शस्त्र दिए इसके बाद ही महिषासुर का वध माता ने किया।

तुलजा भवानी और चामुंडा माता: 👉 चंड और मुंड दो भाइयों का वध करने के बाद माता अम्बिका को ही चामुंडा के नाम से जाना जाने लगा। महिषासुर मर्दिनी को ही कई जगहों पर तुलजा भवानी के नाम से जाना जाता है। तुलजा भवानी और चामुंडा की पूजा खासतौर पर महाराष्ट्र में ज्यादा की जाती है।

दश महाविद्यायें:👉  इनमें से कुछ देवी अम्बा के रूप हैं तो कुछ देवी सती या मां पार्वती या राजा दक्ष की अन्य पुत्रियां हैं। इनके नाम निम्नलिखित हैं-
1.काली, 2.तारा, 3.त्रिपुरसुंदरी, 4.भुवनेश्वरी, 5.छिन्नमस्ता, 6.त्रिपुरभैरवी, 7.धूमावती, 8.बगलामुखी, 9.मातंगी और 10.कमला।

वाहन सिंह या शेर क्यों?
एक कथा के अनुसार माता पार्वती भगवान शिव को पाने के लिए हजारों सालों तक तपस्या करती रहीं, इस वजह से वह काली हो गयीं। शादी हो जाने के बाद एक बार भगवान शंकर ने मजाक में उन्हें काली कह दिया तो माता पार्वती पुनः कैलाश से वापस आकर तपस्या करने लगी।

 एक दिन एक भूखा शेर उनके पास से गुजरा और उन्हें खाने के बारे में सोचने लगा। लेकिन उसने इंतजार करना उचित समझा। देवी की तपस्या पूरी होने पर उन्हें गोरा होने का वरदान मिला। तब से उन्हें गौरी के नाम से भी जाना जाने लगा। सिंह भी माता के साथ-साथ कई सालों तक तपस्या करता रहा, इससे माता ने प्रसन्न होकर उसे अपना वाहन बना लिया। ज्यादातर देवियों के वाहन सिंह ही हैं।

Tuesday, 16 October 2018

रत्नों का ज्ञान

वर्जित रत्न - किन 2 रत्नों को एक साथ नहीं पहनना चाहिए ? - अब रत्न कब पहने जा सकते है ?

कोई भी रत्न शुक्ल पक्ष में धारण करना चाहिए. रत्न धारण करते समय चंद्रमा का बल भी महत्वपूर्ण होता है. इसलिए, रत्न शुक्ल पक्ष की पञ्चमी/षष्ठी से लेकर कृष्ण पक्ष की पञ्चमी/षष्ठी तक धारण कर चाहीये। अब, शुक्ल पक्ष की पञ्चमी 14 अक्टूबर से लेकर कृष्ण पक्ष की षष्ठी 30 अक्टूबर तक कोई भी रत्न धारण किया जा सकता है।

परस्पर विरोधी ग्रहों के रत्न :
बहुत से ज्योतिषी आजकल परस्पर विरोधी ग्रहों के रत्न पहनने की सलाह दे देते हैं. मुझे एक पुरानी बात याद आ रही है. फरवरी का महीना था. थोड़ी सी कभी ठंडक हो जाती थी, और दोपहर को गर्मी. एक सरकारी अधिकारी से मिलने गया. उन्होंने पैरों के पास हीटर और ऊपर पंखा चलाया हुआ था. मुझे हंसी आई और मैंने पूछा, कि मियां सरकारी बिजली है, तो इस तरह फूँक रहे हो, पर यह तो निर्णय कर लो कि आपको सर्दी लग रही है, या गर्मी.

जब भी लोगों को, जहाँ तक कि कई ज्योतिषियों को भी पुखराज और पन्ना, आदि पहने देखता हूँ तो बात याद आ जाती है.
(यह मेरे तुच्छ विचार हैं. जो ऐसे रत्न पहनते हैं, हो सकता है, अधिक ज्ञानी हों !)

निम्न रत्नों को एक साथ नहीं पहनना चाहिए :
- माणिक्य के साथ- नीलम, हीरा/ओपल, गोमेद, लहसुनिया वर्जित है।
- मोती के साथ- हीरा/ओपल, पन्ना, नीलम, गोमेद, लहसुनिया वर्जित है।
- मूंगा के साथ- पन्ना, हीरा/ओपल, गोमेद, लहसुनिया वर्जित है।
- पन्ना के साठ- पुखराज, मूंगा, मोती वर्जित है।
- पुखराज के साथ- हीरा/ओपल, नीलम, गोमेद वर्जित है।
- हीरे के साथ- माणिक्य, मोती, मूंगा, पुखराज वर्जित है।
- नीलम के साथ- माणिक्य, मोती, पुखराज वर्जित है।
- गोमेद के साथ- माणिक्य, मूंगा, माणिक्य, पुखराज वर्जित है।
- लहसुनिया के साथ- माणिक्य, मूंगा, पुखराज, मोती वर्जित है।

नोट : 1. वैसे तो, सूर्य और बुध मित्र हैं. इसलिए, ऐसा बहुत से ज्योतिषी यह कह देते हैं, कि पन्ना और माणिक्य साथ-२ पहने जा सकते हैं. पर, व्यक्ति का लग्न कोई भी हो, अगर सूर्य सहायक ग्रह होगा, तो बुध शत्रु, और अगर बुध सहायक होगा, तो सूर्य शत्रु का काम करेगा.
2. रत्न और उपाय, केवल व्यक्ति के लग्न से निर्धारित होते हैं, राशि से नहीं. हमारे विचार में, और विद्वान् ज्योतिषियों की राय में भी, राशि, या नाम से रत्न नहीं पहना जाता. पहले अपनी कुंडली का विश्लेषण किसी अच्छे ज्योतिष से परामर्श लेवे फिर भी कोई रतन धारण करें वरना जीवन में कई परेशान के कारण भी बन सकता है।

Monday, 15 October 2018

सी.बी.एस.ई. एथलैटिक मीट का आयोजन



शांति ज्ञान निकेतन सी. सै. स्कूल द्वारका सै0 - 19 नई दिल्ली ने सी.बी.एस.ई. एथलैटिक मीट कलस्टर 20वी का सफल आयोजन 11 अक्तुबर 2018 को पोलो ग्राऊडं दिल्ली विश्वविद्यालय में किया गया। इस कार्यक्रम के मुख्यातिथि श्री आदेश गुप्ता मैयर उत्तरी दिल्ली नगर निगम परिषद ने दीप प्रज्जलित करके कार्यक्रम का शुभारम्भ किया। विद्यालय संस्थापक श्री राजकुमार खुराना जी ने मुख्यातिथि जी का पुष्पगुच्छों से स्वागत किया। इस एथलीट मीट में दिल्ली के सर्वोत्तम 188 स्कूलों ने व इनके लगभग 3000 खिलाड़ी छात्रों ने भाग लिया और इस एथलीट मीट में 23 प्रकार के खेलों के खिलाडियों ने अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया।
इस एथलैटिक मीट के आयोजक शान्ति ज्ञान निकेतन स्कूल के छात्रो ने समूह गान ‘‘आओ चले” एव पंजाबी गिद्धा रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत करके समस्त दर्शकों का मन मोह लिया।
मुख्यातिथि श्री आदेश गुप्ता ने एथलैटिक मीट के आयोजक शांतिज्ञान निकेतन स्कूल प्रबन्धक व संस्थापक श्री राजकुमार खुराना जी का धन्यवाद किया। श्री आदेश गुप्ता जी ने
प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्रमोदी जी का भी खेलों को विशेष बढावा देने के लिए धन्यवाद किया और कहा की आज खेलों  का जमाना है और भारतीय खिलाड़ी आलम्पिक में मैड़ल लाकर देश का नाम रोशन कर रहे हैं।
सभी खिलाड़ियों को शांति ज्ञान निकेतन स्कूल की हैमर थ्रो के नैशनल खिलाडी हर्षिता सहरावत ने शपथ दिलाई की हम खेलों को लगन व खेल भावना से खेलेंगे। श्री आदेश गुप्ता जी ने भी सभी प्रतिभागी खिलाडियों को शुभकामनाएँ देते हुए सबको विशेष प्रदर्शन के लिए प्रेरणा दी।
इस शुभावसर पर शांति ज्ञान निकेतन स्कूल के प्रबन्धक श्री राजकुमार खुराना जी ने भी सभी विजेता खिलाडियों को बधाई दी और सर्वोत्तम प्रदर्शन करने के लिए प्रेरणा दी।
शांति ज्ञान निकेतन स्कूल के व्यवस्थापक श्री आकाश खुराना जी ने सभी दर्शकों व खिलाडियों का धन्यवाद करते हुए कहा कि खेलों से भी हमें मान-सम्मान व पहचान मिलती है इसलिए हमें पूरी लग्न से खेलों में भाग लेना चाहिए और तन-मन से उत्कृष्ट प्रदर्शन करना चाहिए।
कार्यक्रम के अन्त में एथलैटिक मीट के आयोजक स्कूल के चैयरमेन श्री सुरेन्द्र खुराना जी ने सभी आयोजकों प्रतिभागी छात्रों व मुख्यातिथियों का हार्दिक स्वागत व धन्यवाद  किया और इस एथलैटिक मीट के सफल आयोजन के लिए सभी को शुभ कामनाएँ प्रदान की।।

नवरात्रि की साधना


  इस नवरात्रि के दिव्य संक्रमण काल पर अपना आध्यात्मिक उत्थान चाहने वालों को अवश्य ही पूरी पवित्रता और एकाग्रता से साधना में दत्तचित्त हो जाना चाहिये। संख्या पूरी करने की हड़बड़ी छोड़कर प्रेम और एकाग्रता को अपनाना चाहिये। कम से कम दोनों काल (प्रातः सायं) में तीन घंटा समय निकाल कर 26 माला प्रति दिन नियमित समय पर जपना चाहिए। 10 माला जपने में साधारणतया एक घंटे का समय लगता है। इस भाँति 24000 का लघु अनुष्ठान पूरा करना चाहिये। जो इतना भी अपनी विविध व्यस्तताओं के कारण नहीं कर सकें , उन्हें कम से कम प्रति दिन दोनों सन्ध्या में 10 माला तो अवश्य ही जप कर लेना चाहिये। जो समय नवरात्रि की साधना में लगेगा, वह कदापि निष्फल न होगा।

साधना के नियम साधारण ही हैं। शौच स्नान से निवृत्त होकर शुद्धतापूर्वक प्रातःकालीन उपासना पूर्व मुख एवं सन्ध्या काल की पश्चिम मुख होकर करनी चाहिये। जप के समय घी का दीप या कम से कम धूपबत्ती जलती रहे। जल का पात्र निकट में रहे। नित्य सन्ध्या कर लेने के उपरान्त गायत्री माता और गुरु का पूजन करके जप प्रारम्भ कर देना चाहिये। नियमित जप समाप्त कर सूर्य के सम्मुख जल चढ़ा देना चाहिये।

जिस भाँति उपयुक्त नक्षत्र, तिथि एवं दिवसों में बोये बीज, अनुकूल वृष्टि, सिंचाई एवं खाद प्राप्त कर एक विशेष रूप में पुष्ट और उन्नत फल प्रदान करते हैं, उसी प्रकार नवरात्रि की उपासना अन्य समयों में की गई उपासना की अपेक्षा अधिक बलशालिनी और फलवती होती है। जैसे दिन-रात्रि का मिलन काल-सन्ध्या, आध्यात्मिक उपासना करने के लिये अधिक उपयुक्त होती है, उसी प्रकार शीत और शीत की मिलन-वेला आश्विन नवरात्रि होती है। इस संक्रमण काल में जिस भाँति भौतिक प्रकृति अपने विशाल क्षेत्र में एक अवस्था से दूसरी में प्रवेश करती है, उसी भाँति सूक्ष्म प्रकृति के क्षेत्रों में भी उस समय संक्रमण काल उपस्थित होता है। ऐसे समय में जो साधक सावधान और एकाग्र चेतना से उपासना करता है, उसे सहसा ही अपना निचला स्तर छोड़कर ऊर्ध्व के स्तर में जाने की सर्वव्यापिनी शक्ति द्वारा बल, सहायता और गति प्रदान की जाती है। जिसे अन्य समय में वह अपनी वैयक्तिक उपासना के बल पर पाने में असमर्थ था, वह अनायास ही उपलब्ध हो जाता है। इस भाँति नवरात्रि उपासना का विशाल परिणाम निष्ठावान एवं सच्चे उपासकों को मिलता रहता है।

नवरात्रि उपासना में ब्रह्मचर्य पालन अत्यावश्यक है। जो कर सकें, वे उपवास भी करें, परिमित फल और दूध लेना भी उपवासवत् ही है। जिनसे ऐसा नहीं बन पड़े, वे भी सात्विक-परिमित भोजन करें। स्वाद के लिये न खायें, अतः यथासम्भव नमक और मीठा (चीनी मिष्ठानादि) छोड़ दें। यह भी श्रेष्ठ व्रत ही है। इसके अतिरिक्त, पूरा या नियमित समय तक मौन, भूमि-शयन, चमड़े की बनी वस्तु का त्याग, पशुओं की सवारी का त्याग, अपनी शारीरिक सेवायें स्वयं करना, अपनी हजामत, वस्त्र धोना, भोजन बनाना आदि सेवायें दूसरे से न लेने का व्रत भी निभाने का प्रयत्न करें। अपनी सुख-सुविधाओं को यथासम्भव त्याग कर उपासना में लीन होना ही तप है।

जो साधक पूर्णाहुति में आ रहे हों, उन्हें घर में ही अपना जप समाप्त कर पंथ में मानसिक जप करते रहना चाहिये। यदि किसी कारणवश ऐसा न हो सके तो उन्हें कुछ पूर्व ही तपोभूमि आकर अपना जप पूरा करना चाहिये। रास्ते में मानसिक जप करते रहना उत्तम है।

शयन के नियम

शयन के नियम



1.- सूने घर में अकेला नहीं सोना चाहिए। देवमन्दिर और श्मशान में भी नहीं सोना चाहिए। *(मनुस्मृति)*
2.- किसी सोए हुए मनुष्य को अचानक नहीं जगाना चाहिए। *(विष्णुस्मृति)*
3.- विद्यार्थी, नौकर औऱ द्वारपाल, ये ज्यादा देर तक सोए हुए हों तो, इन्हें जगा देना चाहिए। *(चाणक्यनीति)*
4.- स्वस्थ मनुष्य को आयुरक्षा हेतु ब्रह्ममुहुर्त में उठना चाहिए। *(देवीभागवत)*
5.- बिल्कुल अंधेरे कमरे में नहीं सोना चाहिए। *(पद्मपुराण)*
6.- भीगे पैर नहीं सोना चाहिए। सूखे पैर सोने से लक्ष्मी (धन) की प्राप्ति होती है। *(अत्रिस्मृति)*
7.- टूटी खाट पर तथा जूठे मुंह सोना वर्जित है। *(महाभारत)*
8.- नग्न होकर नहीं सोना चाहिए। *(गौतमधर्मसूत्र)*
9.- पूर्व की तरफ सिर करके सोने से विद्या, पश्चिम की ओर सिर करके सोने से प्रबल चिन्ता, उत्तर की ओर सिर करके सोने से हानि व मृत्यु, तथा दक्षिण की तरफ सिर करके सोने से धन व आयु की प्राप्ति होती है। *(आचारमय़ूख)*
10.- दिन में कभी नही सोना चाहिए। परन्तु जेष्ठ मास मे दोपहर के समय एक मुहूर्त (48 मिनट) के लिए सोया जा सकता है। *(जो दिन मे सोता है उसका नसीब फुटा है)*
11.दिन में तथा सुर्योदय एवं सुर्यास्त के समय सोने वाला रोगी और दरिद्र हो जाता है। *(ब्रह्मवैवर्तपुराण)*
12.- सूर्यास्त के एक प्रहर (लगभग 3 घंटे) के बाद ही शयन करना चाहिए।
13.- बायीं करवट सोना स्वास्थ्य के लिये हितकर हैं।
14.- दक्षिण दिशा (South) में पाँव रखकर कभी नही सोना चाहिए। यम और दुष्टदेवों का निवास रहता है। कान में हवा भरती है। मस्तिष्क में रक्त का संचार कम को जाता है स्मृति- भ्रंश, मौत व असंख्य बीमारियाँ होती है।
15.- ह्रदय पर हाथ रखकर, छत के पाट या बीम के नीचें और पाँव पर पाँव चढ़ाकर निद्रा न लें।
16.- शय्या पर बैठकर खाना-पीना अशुभ है।
17.- सोते सोते पढना नही चाहिए।
18.- ललाट पर तिलक लगाकर सोना अशुभ है। इसलिये सोते वक्त तिलक हटा दें।

कैसे पडता है ग्रहो का प्रभाव मानव जीवन पर... इसका लौजिक क्या है।

       प्रत्येक मानव के पास दिल दिमाग हाथ पैर और शरीर के अंग एक जैसे होते है , भगवान् ने सबका शरीर एक समान बनाया है पर सबकी सोच व कार्य...